आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर प्रकाश झा द्वारा directed "आरक्षण "फिल्म की चर्चा जोरों पर है |यहाँ तक की इस फिल्म को कुछ राज्यों द्वारा प्रतिबंधित भी कर दिया गया ,उसके बाद जबकि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को प्रसारित करने की मान्यता दे दी है|
कुछ जातिवर्ग विशेष लोगों द्वारा फिल्म का व्यापक विरोध हुआ ,दलील यह दी गई की फिल्म के रिलीज होने से देश की एकता-अखंडता को खतरा हो जायेगा,कारण यह बताया गया की फिल्म में कुछ आपत्तिजनक दृश्य एवं संवाद है,जिससे वर्ग विशेष को ठेस पहुँचता|खैर फिल्म रिलीज हुई ,दो-तीन राज्यों में प्रतिबन्ध के साथ और कुछ दृश्यों की काँट-छाँट के बाद |जिन राज्यों में फिल्म रिलीज हुई वहां से अभी तक एकता-अखंडता के नुकसान की कोई सूचना अभी तक तो प्राप्त नहीं हुई है|फ़िलहाल अब यह फिल्म सभी राज्यों में देखी जा सकती है,फिल्म का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों से मै यह प्रश्न करना चाहूँगा कि क्या उन्हें देश कि संस्कृति और संस्कार से कोई लेना देना नहीं?जिसकी नीव पर ही एकता और अखंडता कि ईमारत टिकती है|प्रत्येक माह कितनी ही ऐसी फिल्मे रिलीज होती है जिनमे बहुत कुछ आपत्तिजनक एवं अश्लील होता है ,जिनके प्रभावों के बारे में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं ,जिसने मर्यादा संस्कार और संस्कृति का पूर्णरुप से हनन कर दिया है|इन फिल्मो के लिए न तो किसी प्रकार की कोई काँट-छाँट की कोई आवश्यकता होती है न विरोध वगैरह की|थोड़ा बहुत हो हल्ला होता है,लेकिन सब publicity के लिए इस प्रश्न पर बुद्दजीवियोँ का जवाब बड़ा हास्यास्पद है,वे इन अमर्यादित फिल्मोँ को केवल मनोरंजन का साधन भर मानतेँ हैँ ,अब मैँ यह कहूँ कि इस विवादास्पद 'आरक्षण' फिल्म को मात्र मनोरंजन का साधन मान लिया जाए तो...............
वास्तव मेँ फिल्म मेँ आरक्षण मुद्दे पर कटु सत्य को दिखाया गया है जो जातिवादी उन्मादियोँ द्वारा बर्दाश्त नहीँ किया जा रहा है,फिल्म के आलोचक जनता को सच्चाई से दूर क्योँ रखना चाह रहेँ हैँ?खैर अब आप उत्तर प्रदेश मेँ भी इस फिल्म को निश्चिँत होकर देख सकते हैँ।
यदि इस फिल्म के कारण कोई उन्माद भड़का होता तो इसके दोषी मात्र वे हीँ होते जिन्होँने फिल्म का विरोध किया।विरोध उन फिल्मोँ का होना चाहिए जिनके लिए विरोध आवश्यक है।'आरक्षण'फिल्म का विरोध करनेँ वाले लोग हीँ देश मेँ एकता और अखण्डता के ध्वंस के दोषी हैँ।क्या नहीँ है ऐसा?विचार करके देखिए....................