Sunday, 14 July 2013

द्वन्द्व

             
तेरी वाणी ,मेरी अभिव्यक्ति
तू पथप्रदर्शक ,मै पथिक 
स्वर्णिम मुख ,तेरा प्रत्बिम्ब 
तेरे फैसले, मेरा आगाज । 

कारण के खोज में हू मै आज भी तेरे अस्तित्व के ,
ये असर था "दिल की सुनो "का 
या  तेरी  आवाज़ ही ऊँची थी । 

विचलित मन, तेरी दिलासा 
सुनी  रातें ,तेरी बातें 
कठिन संघर्ष ,विजय तेरी । 

क्यों  चिंतन  हारा तुझसे ,
क्यों गिरा मै गर्त में खुद से ,
क्यों  पिलाया गरल प्रेम का ?

मेरा मस्तिष्क ,तेरा चिंतन
मेरा हृदय ,तेरा कुञ्चन
सांसे 'तेरी' ,बस जीवन मेरा |

Sunday, 3 February 2013

बेजान बंदिगी

नापसन्द  है तुझे अमन इस ज़मी पर ,
वाकिफ़ हो चुका मै ,झूठ और फ़रेब की तेरे इस ज़न्नत से ,
 पता नही ,तुझे तेरे अपनों से क्या ख़ता है?

तेरे खिलौने ,करते तुझे रौशनी है ,
ये सोचकर कि तू कितना दिलनशीं है ,

उन्हें पता कहाँ ,
नही फ़िक्र है तुझे उनके हिफ़ाजत की ,
बना के छोड़ दिया तूने ,टूटने को उन्हें ,
तोड़ने वाले भी तो तेरे अपने ही हैं ,

पूछता हूँ  मै एक सवाल आज तुझसे ,
देखकर हैवानियत इस जमीं पर ,
क्या तू खुद पर यकीन कर पायेगा ?
है विश्वास, तू इस बार न मुकर पायेगा ,

देख मेरी आँखों में दर्द का समन्दर ,
तेरी हुकूमत अब बर्दाश्त नही  होती ,
दिखा हिम्मत और सामने आ ...
 उठा गाण्डीव और बन जा अर्जुन ,
इतिहास गवाह है तू नाउम्मीद नही करेगा ,

तेरे मुकर जाने पर ,
जब होगा हर तरफ धुआं -धुआं ,
ख़ुशी होगी तेरी कोई इबादत न होगी ।