Monday, 20 June 2011


सोचा था जाउँगा चाँद तलक
उठ ना पाया जमीं से ,

सोचा था कदमों में नाप दूंगा दुनिया सारी,
चल ना पाया कदम  भर ,

सोचा था कर दूंगा सर्वस्व प्रकाश ,
हो गया जीवन अंधकारमय अपना

सोचा था लिखूंगा सफलता के गीत इन हाथों से ,
असफलता के इस संगीत को कोई रोक ना पाया

जीवन की इन प्रतिकूलताओं से होगा `विशिष्ट` भी  अनभिज्ञ 
मैंने सोचा ना था ..................................






 

Monday, 23 May 2011

सपने देखना तो मेरी आदत है ,और सपने टूटना मेरी किस्मत है.ही 
हर बार इन टूटे हुए सपनो के कुछ टुकड़े तो हाथ लग ही गए लेकिन इस बार
तो सपनो के टूटने  की आवाज़ भी कानो तक नहीं पहुँच रही है.
हाय रे ये किस्मत ...............